चौपारण: हजारीबाग जिले के चौपारण प्रखंड अंतर्गत हथिन्दर जंगल में वन भूमि पर अवैध जुताई करते पकड़े गए ट्रैक्टर को महज 48 घंटे में छोड़ दिए जाने के मामले ने तूल पकड़ लिया है, पूर्व विधायक उमाशंकर अकेला ने सीधा आरोप लगाया है कि वन विभाग ने मोटी रकम लेकर ट्रैक्टर छोड़ा है।
प्रेस कॉन्फ्रेंस में गंभीर आरोप: मोटी रकम लेकर ट्रैक्टर छोड़ा गया
अपने आवास पर बुलाई गई प्रेस कॉन्फ्रेंस में पूर्व विधायक उमाशंकर अकेला ने वन विभाग की कार्यप्रणाली पर सीधा और कड़ा प्रहार किया। उन्होंने कहा कि हथिन्दर जंगल में वन भूमि पर जोत-कोड करते हुए ट्रैक्टर पकड़ा गया था। वन विभाग ने बड़ी बहादुरी से जब्ती दिखाई, लेकिन वह ट्रैक्टर महज दो दिन में रेंजर कार्यालय से ऐसे गायब हो गया जैसे कभी पकड़ा ही न गया हो। पूर्व विधायक ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि यह कार्रवाई केवल दिखावे के लिए थी, इसकी समाप्ति पर्दे के पीछे मोटी रकम के लेन-देन से हुई है। यह बयान अब केवल एक आरोप नहीं रहा, बल्कि वन विभाग के माथे पर लगा एक बड़ा सवाल बन गया है जिसका जवाब विभाग के किसी अधिकारी के पास नहीं दिख रहा है।
वन विभाग का बचाव: वन पट्टे का झूठा कफन
जब इस गंभीर आरोप पर वन विभाग के अधिकारियों से सवाल पूछा गया तो उनके पास कोई ठोस जवाब नहीं था। घुमा-फिराकर कहा गया कि संबंधित जमीन का वन पट्टा होने के कारण ट्रैक्टर को छोड़ दिया गया। पूर्व विधायक ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए पूछा कि यदि जमीन वैध थी और वन पट्टा था तो जब्ती की नौबत ही क्यों आई? और यदि अवैध थी तो मुक्ति कैसे मिल गई? क्या वन पट्टा अब जंगल को जोतने और उजाड़ने का सरकारी पास बन गया है? दो दिन में कौन सा सत्यापन हो गया, कौन सी फाइल चली और किस वरीय अधिकारी ने इतनी जल्दी मुक्ति का आदेश दे दिया? ये तमाम सवाल अनुत्तरित हैं। इस पूरे प्रकरण ने चौपारण, इटखोरी और हजारीबाग के पूरे वन परिक्षेत्र की हकीकत को उजागर कर दिया है।
रेंजर से लेकर वनपाल तक: पूरा तंत्र कठघरे में
यह मामला केवल एक ट्रैक्टर का नहीं है। क्षेत्र में चर्चा आम है कि बिना रेंजर कार्यालय की सहमति के एक जब्त वाहन का दो दिन में छूटना असंभव है। जंगल में चलने वाले प्रत्येक ट्रैक्टर, प्रत्येक ट्रक, बालू और लकड़ी के प्रत्येक अवैध कारोबार से एक मोटी रकम की बंदरबांट होती है। दिन में वर्दी का खौफ दिखाया जाता है और रात में उसी वर्दी की छाया में मोटी रकम लेकर जंगल को नष्ट करने की खुली छूट दे दी जाती है। पूर्व विधायक ने कहा कि यदि वन की रखवाली करने वाले ही मोटी रकम लेकर वन का सौदा करने लगें, तो जंगल बचेगा कैसे? सरकार वन बचाने की बात करती है और नीचे बैठे लोग मोटी रकम लेकर वन को बिकवा रहे हैं।
युवा सोच के तीखे सवाल और जांच की मांग
पूर्व विधायक ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से युवा सोच का प्रतिनिधित्व करते हुए वन विभाग से सीधे सवाल किए हैं। उन्होंने मांग की है कि मोटी रकम के लेन-देन के इस आरोप की निष्पक्ष जांच कराई जाए। हनिन्दर मामले में ट्रैक्टर को छोड़ने का लिखित आदेश किसने दिया और किस आधार पर दिया, उसे सार्वजनिक किया जाए। साथ ही पिछले एक साल में चौपारण रेंज में कितने वाहन जब्त हुए और कितने मोटी रकम लेकर छोड़े गए, उसकी पूरी सूची जारी की जाए। इस मामले ने स्थानीय राजनीति में भूचाल ला दिया है और आम जनता भी अब वन विभाग की कार्यशैली पर सवाल उठा रही है। हजारीबाग जिले के वन क्षेत्रों की सुरक्षा को लेकर यह एक गंभीर चिंता का विषय बन गया है। हजारीबाग जिला की आधिकारिक जानकारी के लिए यहां क्लिक करें।
वन संपदा की लूट पर कब लगेगा अंकुश?
इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वन संपदा की लूट में विभागीय मिलीभगत गहरी है। जब तक दोषी अधिकारियों और कर्मचारियों पर कड़ी कार्रवाई नहीं होगी, तब तक जंगल बचाने के नारे केवल कागजों तक सीमित रहेंगे। पूर्व विधायक उमाशंकर अकेला के इस खुलासे के बाद प्रशासनिक महकमे में हड़कंप मचा हुआ है। देखना यह होगा कि वरीय अधिकारी इस मामले का संज्ञान लेकर कोई ठोस कार्रवाई करते हैं या फिर इसे भी लीपापोती कर दबा दिया जाता है। चौपारण की जनता अब जाग चुकी है और वह अपने जंगल की लूट बर्दाश्त करने के मूड में नहीं है।



