Giridih: झारखंड की पावन और खनिज संपदा से समृद्ध धरती गिरिडीह इन दिनों आदिवासी संस्कृति, अस्मिता और अटूट आस्था के रंगों से पूरी तरह सराबोर है। मौका था ऐतिहासिक ‘मारांग बुरू घोरोमगाड़ महासम्मेलन’ का, जहां झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन समेत देश के विभिन्न राज्यों से पहुंचे हजारों आदिवासियों, प्रकृति प्रेमियों और गणमान्य अतिथियों का महासैलाब उमड़ पड़ा। इस महासम्मेलन ने एक बार फिर साबित कर दिया कि झारखंड की मूल संस्कृति और आदिवासी स्वाभिमान की जड़ें कितनी गहरी और मजबूत हैं।
“मारांग बुरू को शत-शत नमन”… मुख्यमंत्री ने की पूजा-अर्चना
झारखंड की लोक संस्कृति में ‘मारांग बुरू’ को सर्वोच्च आराध्य और प्रकृति की असीम शक्ति का प्रतीक माना जाता है। सम्मेलन की शुरुआत पारंपरिक आदिवासी रीति-रिवाजों और मंत्रोच्चार के साथ हुई, जिसमें मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सपरिवार और अन्य गणमान्य लोगों के साथ शीश झुकाकर मारांग बुरू को शत-शत नमन किया।
कार्यक्रम स्थल पर पहुंचते ही मुख्यमंत्री ने पारंपरिक जोहार के साथ सभी का अभिवादन किया। इस दौरान पूरा पंडाल पारंपरिक ‘जोहार! जोहार मारांग बुरू!’ के जयकारों और पारंपरिक मादक नगाड़ों की गूंज से गूंज उठा।
विभिन्न राज्यों से जुटे आदिवासी प्रतिनिधि और प्रबुद्ध जन
इस ऐतिहासिक महासम्मेलन में हिस्सा लेने के लिए झारखंड के अलावा ओडिशा, पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़ और असम जैसे पड़ोसी राज्यों से बड़ी संख्या में आदिवासी प्रतिनिधि, बुद्धिजीवी और सामाजिक कार्यकर्ता पहुंचे।
मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने विभिन्न राज्यों से आए सभी मेहमानों और प्रबुद्ध जनों का हार्दिक स्वागत और आभार व्यक्त किया। उन्होंने अपने संबोधन में इस बात पर जोर दिया कि जल, जंगल, जमीन और अपनी संस्कृति की रक्षा ही हमारा असली स्वाभिमान है और सरकार इस दिशा में पूरी तरह प्रतिबद्ध है।
पारंपरिक वेशभूषा, मनमोहक लोक नृत्य और पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच आयोजित इस महासम्मेलन ने पूरे इलाके में एक अभूतपूर्व ऊर्जा और सांस्कृतिक उल्लास भर दिया है। गिरिडीह की धरती पर हुआ यह आयोजन आदिवासी समाज की एकता, संस्कृति और अस्तित्व की रक्षा का एक नया मील का पत्थर साबित हो रहा है।


