उज्जैन: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने युवाओं से धर्म को पूजा-पद्धति की सीमाओं से बाहर निकाल कर जीवन और आचरण से जोड़ने का आह्वान किया है। उन्होंने कहा कि धर्म को अंग्रेजी के ‘रिलीजन’ शब्द का समानार्थी मानना सही नहीं है। ‘रिलीजन’ का संबंध बांधने और अनुशासन में रखने से है, जबकि धर्म व्यक्ति को मुक्त करता है।
मोहन भागवत युवा धर्म संसद में धर्म की व्यावहारिक व्याख्या
सेवाज्ञ संस्थानम के तत्वावधान में यहां गीता भवन में आयोजित तीन दिवसीय युवा धर्म संसद के उद्घाटन सत्र में शुक्रवार को डॉ. भागवत ने कहा कि भारत में धर्म जीवन के हर चरण में मौजूद रहता है। इसे मानें या न मानें, अस्तित्व के आरंभ से अंत तक धर्म बना रहता है और जीवन के अनेक नियम उसी के अनुरूप चलते हैं। उन्होंने युवाओं से ऐसा जीवन जीने की अपील की, जिससे पूरा विश्व उनसे प्रेरणा ले। उनके अनुसार धर्म को किसी एक आयु, पूजा या धार्मिक गतिविधि तक सीमित नहीं किया जा सकता।
डॉ. भागवत ने धर्म की व्यावहारिक व्याख्या करते हुए कहा कि हम भोजन करते हैं, लेकिन उसके बाद कचरा नहीं करते, यह भी धर्म है। सड़क पर यातायात नियमों का पालन करना भी धर्म है। यानी धर्म व्यक्ति के रोजमर्रा के व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। अपनी उपासना-पद्धति, जो प्रकृति, गुरु या परंपरा से मिली है, उसका सम्मान होना चाहिए और दूसरों की उपासना-पद्धति का भी उतना ही सम्मान किया जाना चाहिए। किसी को अपने मत में परिवर्तित करने की कोशिश न करना भी धर्म के आचरण का हिस्सा है।
रिलीजन और धर्म में मूलभूत अंतर स्पष्ट किया
संघ प्रमुख भागवत ने कहा कि पश्चिमी समाज ने भारत में धर्म के आचरण, कर्मकांड और अनुशासन को देखा और उसे अपने यहां प्रचलित ‘रिलीजन’ के समान समझ लिया। बाद में भारत में भी धर्म के लिए इसी शब्द का इस्तेमाल होने लगा। भागवत ने कहा कि धर्म के कर्मकांड उसके अभ्यास का हिस्सा हैं, लेकिन कर्मकांड ही पूरा धर्म नहीं है। उन्होंने ‘रिलीजन’ शब्द की व्युत्पत्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि इसका संबंध बांधने और एक अनुशासन में रखने से है, जबकि धर्म का मूल अर्थ धारण करने से जुड़ा है।
उन्होंने गुरुदेव रानाडे का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके अनुसार हर धर्म के ऊपर एक और धर्म है। जब अलग-अलग ‘रिलीजन’ धर्म के अनुसार चलते हैं तो वे मनुष्य को मुक्ति की ओर ले जाते हैं, लेकिन जब वे धर्म से हट जाते हैं तो सांप्रदायिक कलह और धर्म के नाम पर अत्याचार की स्थितियां पैदा हो सकती हैं। उनके अनुसार भारत में लंबे समय तक अपनी विरासत को भूलने के कारण ऐसी कई मानसिक गांठें बनी हैं, जिन्हें सत्य और ज्ञान के माध्यम से दूर करने की आवश्यकता है।
मानव अहंकार और प्रकृति के नियम
डॉ. भागवत ने इस दौरान मानव अहंकार को धर्म की समझ में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक बताया। उन्होंने कहा कि मनुष्य जब अपने अहंकार में यह मान बैठता है कि दुनिया उसकी इच्छा और नियंत्रण के अनुसार चलेगी, वहीं से उसकी सबसे बड़ी गलतफहमी शुरू होती है। प्रकृति किसी व्यक्ति की सत्ता नहीं मानती और उसके नियम मनुष्य की इच्छा से नहीं बदलते। सूर्य का उदय और अस्त इसका सहज उदाहरण है।
उन्होंने उस धारणा को भी खारिज किया कि भगवद्गीता और रामायण सेवानिवृत्ति के बाद पढ़ने वाले ग्रंथ हैं। उन्होंने कहा कि धर्म अस्तित्व के प्रारंभ से लेकर अंत तक बना रहता है, इसलिए युवावस्था में धर्म को समझना और उसे जीवन में उतारना उतना ही महत्वपूर्ण है।
भारत की परंपरा और विश्व कल्याण की भावना
सरसंघचालक भागवत ने कहा कि भारत धर्मप्राण देश है। भारत आर्थिक और सामरिक दृष्टि से बड़ा बनेगा, लेकिन यह अंतिम गंतव्य नहीं, एक पड़ाव है। भारत की व्यवस्था को पश्चिमी अर्थ में सेक्युलर समझना उचित नहीं है। भारत में राज्य का दायित्व सभी के साथ भेदभाव नहीं करना और सबका सम्मान करना है।
उन्होंने भारत की परंपरा में परोपकार और सामाजिक दायित्व का उल्लेख करते हुए कहा कि पूर्वजों ने व्यापार किया, कमाया और धर्मदाय के माध्यम से समाज के लिए भी काम किया। शहरों में धर्मशालाएं बनवाई गईं। उनका संदेश था कि अपनी बुद्धि से कमाएं, अपना जीवन चलाएं, किंतु इस तरह नहीं कि दूसरे को कष्ट पहुंचे। जीवन तभी सार्थक है जब व्यक्ति के साथ समाज का जीवन भी आगे बढ़े।
डॉ. भागवत ने कहा कि धर्म सत्य पर आधारित है। दुनिया में अनेकता प्रकृति और सृष्टि का हिस्सा है, इसे स्वीकार करना चाहिए। इसके साथ उन्होंने मनुष्य की एकता को भी रेखांकित किया। उनके अनुसार सत्य कठोर हो सकता है, लेकिन इसी सत्य के कारण मनुष्य के भीतर दूसरों के प्रति संवेदना पैदा होती है। उन्होंने कहा कि भारत ने दुनिया के संघर्षों में अनावश्यक रूप से हस्तक्षेप नहीं किया। अलग-अलग विचारधाराओं की सरकारें सत्ता में रहीं, लेकिन संकट के समय भारत ने लोगों की मदद की। उन्होंने पश्चिम दिशा के एक पड़ोसी देश का नाम लिए बिना कहा कि वह बार-बार विवाद खड़ा करता है और भारत को परेशान करता है। इसके बावजूद भारत ने जरूरत के समय सहायता करते हुए वहां की विचारधारा या सत्ता का हिसाब नहीं लगाया। अधिक जानकारी के लिए आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के इतिहास को देख सकते हैं।
युवा धर्म संसद का आयोजन और भविष्य की योजना
आचार्य मिथिलेश नन्दिनी शरणजी महाराज के मार्गदर्शन में आयोजित इस कार्यक्रम को आयोजकों ने युवा धर्म संसद का छठा संस्करण बताया है। इससे पहले काशी, अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार और काञ्चीपुरम् में इसके आयोजन हो चुके हैं। अगले वर्ष इसका आयोजन द्वारका में प्रस्तावित है। गीता भवन में 17 से 19 सितंबर तक आयोजित इस संसद में देशभर से करीब 1,700 छात्र-छात्राएं भाग ले रहे हैं। कार्यक्रम में शुक्रवार को करीब 300 विद्वान, शिक्षक, शोधकर्ता और धर्माचार्यों ने भी हिस्सा लिया। डॉ. भागवत उद्घाटन सत्र में शामिल हुए, जबकि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव इसके समापन सत्र में 19 सितंबर को शामिल होंगे। कार्यक्रम में धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और सूचना-विचार संघर्ष जैसे विषयों पर संवाद के साथ देशभर से चयनित युवाओं के विशेष उद्बोधन सत्र हो रहे हैं।



