कोलकाता: पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी ने गुरुवार को स्पष्ट निर्देश दिया कि दुर्गापूजा स्टॉल पर शारदोत्सव रोक लगाई जाएगी और सभी आयोजकों को स्टॉल पर अनिवार्य रूप से ‘दुर्गापूजा’ लिखना होगा। उन्होंने कहा कि दुर्गापूजा के अवसर पर लगने वाले स्टॉल और पंडालों में ‘शारदोत्सव’ शब्द का प्रयोग स्वीकार नहीं किया जाएगा।
विधानसभा में कड़ा संदेश
गुरुवार को विधानसभा सत्र के दौरान शुभेंदु अधिकारी ने दुर्गापूजा आयोजनों की नामावली को लेकर अपनी बात रखी। उन्होंने कहा कि दुर्गापूजा बंगाल की अस्मिता और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है। इसे ‘सार्वजनिक उत्सव’ के रूप में मनाया जाता है, लेकिन इसका मूल नाम ‘दुर्गापूजा’ ही रहना चाहिए। किसी भी स्टॉल या आयोजन स्थल पर ‘शारदोत्सव’ लिखे जाने पर अनुमति नहीं दी जाएगी।
नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि पूजा समितियों को सरकारी सहायता प्राप्त करने के लिए निर्धारित नियमों का पालन करना होगा। नियमों का उल्लंघन करने वाले आयोजनों के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई की जाएगी।
धार्मिक स्वतंत्रता और पहचान पर जोर
शुभेंदु अधिकारी ने धार्मिक पहचान से जुड़े मुद्दों पर भी विस्तार से चर्चा की। उन्होंने कहा कि किसी भी परिस्थिति में धार्मिक पहचान के आधार पर किसी विशेष समुदाय या समूह को निशाना नहीं बनाया जाना चाहिए। हिंदू, मुस्लिम, बौद्ध अथवा किसी भी धर्म के लोगों को अपने-अपने धर्म का पालन करने की पूर्ण स्वतंत्रता होनी चाहिए।
उन्होंने विशेष रूप से कहा कि भगवा वस्त्र पहनने, शिखा रखने या धार्मिक माला धारण करने वाले किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक पहचान के आधार पर प्रताड़ित नहीं किया जा सकता। यह संवैधानिक अधिकार है जिसकी रक्षा होनी चाहिए।
कानून-व्यवस्था और राजनीतिक हिंसा पर चिंता
विधानसभा में बोलते हुए उन्होंने राजनीतिक विरोध-प्रदर्शनों के दौरान उत्पन्न तनावपूर्ण स्थितियों पर चिंता जताई। शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि यदि किसी विरोध-प्रदर्शन के दौरान तनाव पैदा होता है तो कानून-व्यवस्था बनाए रखने की प्राथमिक जिम्मेदारी पुलिस प्रशासन की है। जनप्रतिनिधियों को हाथ में लाठी लेकर सड़क पर उतरने की आवश्यकता नहीं है।
उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि मतभेदों के बावजूद हिंसा और तनाव पैदा करने से बचें तथा शांति बनाए रखने को प्राथमिकता दें।
दुर्गापूजा समितियों के लिए स्पष्ट दिशानिर्देश
मुख्य बिंदुओं को रेखांकित करते हुए उन्होंने कहा:
- सभी पूजा पंडालों और स्टॉल पर ‘दुर्गापूजा’ नाम अनिवार्य रूप से प्रदर्शित करना होगा
- ‘शारदोत्सव’ या किसी अन्य वैकल्पिक नाम का प्रयोग वर्जित होगा
- सरकारी अनुदान प्राप्त करने के लिए नियमों का अक्षरशः पालन जरूरी
- नियम उल्लंघन पर प्रशासनिक कार्रवाई का प्रावधान
पश्चिम बंगाल में दुर्गापूजा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक महोत्सव है जिसे यूनेस्को ने 2021 में मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की सूची में शामिल किया है। प्रतिवर्ष हजारों पूजा पंडाल सजते हैं और करोड़ों श्रद्धालु इसमें भाग लेते हैं।
राजनीतिक प्रतिक्रियाएं
इस निर्देश पर सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की ओर से तत्काल कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि दुर्गापूजा के नामकरण को लेकर यह पहल बंगाल की सांस्कृतिक पहचान को रेखांकित करने का प्रयास है। विगत वर्षों में कुछ पूजा समितियों द्वारा ‘शारदोत्सव’ शब्द के प्रयोग को लेकर विवाद सामने आए थे।
शुभेंदु अधिकारी ने स्पष्ट किया कि यह निर्देश किसी समुदाय विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि बंगाल की परंपरा और पहचान को संरक्षित करने के लिए है। उन्होंने सभी पूजा आयोजकों से सहयोग की अपेक्षा व्यक्त की।
आगामी दुर्गापूजा की तैयारियां
इस वर्ष दुर्गापूजा अक्टूबर माह में मनाई जाएगी। प्रशासन ने अभी से तैयारियां प्रारंभ कर दी हैं। कोलकाता नगर निगम और जिला प्रशासन पूजा समितियों के साथ समन्वय बैठकें कर रहे हैं। शुभेंदु अधिकारी के इस निर्देश के बाद पूजा समितियों को अपने बैनर, स्टॉल और प्रचार सामग्री में आवश्यक परिवर्तन करने होंगे।
पश्चिम बंगाल सरकार प्रति वर्ष दुर्गापूजा आयोजन के लिए हजारों पूजा समितियों को आर्थिक सहायता प्रदान करती है। इस बार भी अनुदान वितरण की प्रक्रिया शीघ्र प्रारंभ होने की संभावना है।



