बिहार में 60% कमीशन की सरकार,
गंगा में विलीन हुआ सिमरिया घाट!
बेगुसराय
मिथिला के आस्था और गौरव के प्रतीक सिमरिया घाट को हरिद्वार के हर की पौड़ी की तर्ज पर विकसित और सौंदर्यीकरण करने के नाम पर जल संसाधन विभाग द्वारा लगभग 115 करोड़ रुपये की योजना बिहार में चल रही 60% कमीशन की सरकार के कारण भ्रष्टाचार का भेंट चढ़ गया।
करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद निर्माण के महज एक वर्ष के भीतर घाट का हिस्सा ध्वस्त होकर गंगा में समा गया।सवाल सिर्फ सिमरिया घाट के ध्वस्त होने का नहीं है—सवाल यह है कि जनता के करोड़ों रुपये पानी में कमीशनखोरी में क्यों बह गए?
निर्माण कार्यों की गुणवत्ता को लेकर गंभीर सवाल उठ रहे हैं। वहीं, बिहार के विभिन्न विभागों में काम कर रहे संवेदकों द्वारा ऑफ-कैमरा स्पष्ट बताया जाता है कि काम शुरू होने से पहले ही शासन से लेकर विभागीय स्तर तक के पदाधिकारियों द्वारा 60% तक कमीशन देना पड़ता है। यदि यह दावा सही है, तो फिर बची हुई राशि में गुणवत्तापूर्ण और मानक के अनुरूप निर्माण कैसे संभव है?
क्या बिहार में विकास की कीमत अब 60% कमीशन है?
क्या हर विभाग में कमीशन का खेल चल रहा है?
क्या जनता के गाढ़ी कमाई यानी टैक्स का पैसा योजनाओं के बजाय मौजूदा 60% कमीशन की सरकार के कारण भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहा है?सिमरिया घाट सिर्फ ईंट-पत्थर का निर्माण नहीं था, बल्कि मिथिला के लाखों लोगों की आस्था, पर्यटन और विकास का सपना था। आज उस सपने का इस तरह ध्वस्त होना पूरे मिथिला के साथ विश्वासघात जैसा सवाल खड़ा करता है।
सरकार जवाब दे—115 करोड़ की योजना की गुणवत्ता जांच कब होगी?किसकी जिम्मेदारी तय होगी?और यदि 60% कमीशन का दावा गलत है, तो सरकार इसकी निष्पक्ष जांच कराने से पीछे क्यों हट रही है?जांच के नाम पर खानापूर्ति क्यों किया जा रहा है?जनता को विकास चाहिए, 60%
कमीशनखोरी की सरकार नहीं।
जनता को मजबूत निर्माण चाहिए,
भ्रष्टाचार की नींव पर खड़ी योजनाएं नहीं।



