रक्षाबंधन के त्यौहार की शुरुआत पौराणिक काल में सतयुग से मानी जाती है, जब माता लक्ष्मी ने पाताल लोक में राजा बलि को रक्षा सूत्र (राखी) बांधकर अपना भाई बनाया था। यह पावन त्यौहार हिंदू पंचांग के अनुसार श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है।यह त्यौहार भाई-बहन के अटूट प्रेम, विश्वास और एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का प्रतीक है। बिहार और झारखंड में इसे बेहद खास पारंपरिक और सांस्कृतिक तरीकों से मनाया जाता है।रक्षाबंधन की पारंपरिक छवियहाँ रक्षाबंधन के पारंपरिक अनुष्ठान की एक झलक दी गई है:(भाई की कलाई पर रक्षा सूत्र बांधती और आरती उतारती बहन की एक पारंपरिक छवि)बिहार और झारखंड में रक्षाबंधन मनाने का तरीकाबिहार और झारखंड में रक्षाबंधन का त्यौहार पारंपरिक रीति-रिवाजों और स्थानीय व्यंजनों के साथ बहुत उत्साह से मनाया जाता है। यहाँ के मुख्य रीति-रिवाज निम्नलिखित हैं:घर की सजावट और अल्पना: सुबह उठकर घर के द्वारों और पूजा स्थल को चावल के आटे के घोल (पिठार/अल्पना) से सजाया जाता है।भइयादूज की तरह विशेष टीका: बहनें अपने भाइयों के लिए विशेष थाली सजाती हैं। इसमें रोली, अक्षत (चावल), दीपक, मिठाई और राखी रखी जाती है। भाई को पूर्व या उत्तर दिशा की ओर मुख करके पीढ़े पर बैठाया जाता है।रक्षा सूत्र और आरती: बहनें भाई के माथे पर तिलक लगाती हैं, दाहिनी कलाई पर राखी बांधती हैं और आरती उतारकर उनकी लंबी उम्र की कामना करती हैं। भाई अपनी बहनों को उपहार देने और उनकी रक्षा करने का वचन देते हैं।विशेष व्यंजन: बिहार-झारखंड में इस दिन चना दाल पूरी, खीर, सेवई और सूजी का हलवा विशेष रूप से बनाया जाता है। इसके अलावा स्थानीय मिठाइयों जैसे कि पेड़ा, खाजा और बालूशाही का आदान-प्रदान होता है।पेड़-पौधों को राखी (वृक्ष रक्षाबंधन): झारखंड के जनजातीय और ग्रामीण इलाकों में पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए पेड़ों और प्रकृति को भी रक्षा सूत्र बांधने की अनूठी परंपरा निभाई जाती है।



