विधिवत मन्त्रो उच्चारण के साथ ध्वज स्थापित कर कल्पवास की शुरुआत
तिलरथ बेगुसराय
सर्वमंगला आध्यात्मिक योग विद्यापीठ सिद्धाश्रम के प्रांगण में आशिवन शुक्ल पक्ष संक्रांति तिथि को विधिवत मंत्रोंच्चारण के साथ ध्वज को स्थापित किया गया , सिमरिया कल्पवास की शुरुआत वैदिक युग से ही कहा गया है तथा यहां पर धर्म परायण पुण्यात्मा वृंद संक्रांति के हिसाब से कल्पवास किया करते हैं परंतु कभी-कभी संक्रांति नवरात्र के बीच में भी संक्रांति होने के कारण से हो जाता है जिसमें संकल्पित या वर्णित पुण्यात्मा वृंद संकल्प को छोड़कर कल्पवास में नहीं आ पाते हैं तो पूर्णिमा से पूर्णिमा को ही वह मान के कल्पवास में गंगा सेवन स्नानादि करते हैं सिद्धाश्रम परिसर में विधिवत प्रत्येक वर्ष की भांति इस वर्ष भी शास्त्रानुसार पूज्य महर्षि चिदात्मन जी व सर्व मंगला परिवार एवं आचार्यों के द्वारा मेट्रो उच्चारण के साथ विश्व ब्रह्मांड के कल्याण हेतु राष्ट्रहित जनहित समाज हित संस्कृति हित हनुमत ध्वज राष्ट्रध्वज इंद्र ध्वज का स्थापना किया गया , जिसमें महर्षि चिदात्मन जी ने कहा कि भारत एक धर्म प्रधान देश है जहां का धर्म सनातन आ पौरुषय है सतयुग का प्राकट्य इसी पुनीत कार्तिक महीना के अक्षय नवमी को हुआ है इससे स्पष्ट होता है शास्त्रानुसार सतयुग से ही आदि कुंभ स्थली सिमरिया धाम का कल्पवास चातुर्मास अर्ध कुंभ और महाकुंभ की प्रथा चली आ रही है जब एक राशि पर सूर्य चंद्रमा और बृहस्पति का योग होता है तो कुंभ होता है जो प्रत्येक 12 वर्षों में हुआ करता है अर्ध कुंभ 6 वर्षों पर और कल्पवास प्रतिवर्ष इसी कार्तिक के पुनीत महीना में होता चला रहा है।



